अमृतपाल सिंह की संसद से 60 दिन अनुपस्थिति, क्या जाएगी सांसद की कुर्सी

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में मंगलवार 24 मार्च को सांसद Amritpal Singh की संसद से लगातार अनुपस्थिति को लेकर अहम सुनवाई हुई। अदालत को बताया गया कि उनकी गैरहाजिरी अब 59 बैठकों तक पहुंच चुकी है और यदि यह संख्या 60 तक पहुंचती है, तो उनकी सदस्यता पर खतरा मंडरा सकता है। इस दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल Satya Pal Jain ने कोर्ट को जानकारी दी कि अमृतपाल अपनी अनुपस्थिति को माफ कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
संविधान के नियम और अनुपस्थिति का संकट
सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 104 के तहत यदि कोई सांसद लगातार 60 बैठकों तक अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सीट को रिक्त घोषित किया जा सकता है। हालांकि लोकसभा में एक समिति मौजूद है जो अनुपस्थिति के कारणों की जांच करती है और उचित पाए जाने पर उसे माफ करने की सिफारिश करती है। एएसजी ने बताया कि अमृतपाल की अनुपस्थिति पहले भी दो बार माफ की जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अमृतपाल कारण सहित आवेदन देते हैं, तो समिति उस पर विचार कर सकती है और अंतिम निर्णय लोकसभा लेती है।

गिरफ्तारी और विवादित घटनाओं का इतिहास
Waris Punjab De के प्रमुख अमृतपाल सिंह को 23 अप्रैल 2023 को मोगा के रोडे गांव से गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी एक महीने से अधिक समय तक चली तलाश के बाद हुई थी। यह कार्रवाई 23 फरवरी 2023 को अजनाला में हुई घटना के बाद शुरू हुई थी, जब अमृतपाल और उनके समर्थकों ने पुलिस थाने में घुसकर अपने साथियों की रिहाई की मांग की थी। इस दौरान उनके समर्थकों द्वारा हथियार लहराने और पुलिस से झड़प की खबरों ने पूरे देश में हलचल मचा दी थी।
चुनावी जीत और बढ़ी हुई हिरासत
गिरफ्तारी के बावजूद अमृतपाल सिंह ने 2024 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में हिस्सा लिया और पंजाब के खडूर साहिब सीट से जीत हासिल की। इसके बाद अप्रैल 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत उनकी हिरासत बढ़ा दी गई। वर्तमान में वह असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं। इस बीच उनके नौ सहयोगियों को पंजाब वापस लाया गया, जिन्हें अजनाला घटना से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। अब उनकी लगातार अनुपस्थिति और कानूनी स्थिति को देखते हुए राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज हो गई है।